बिछड़ गए हम आपसे जिस लम्हे में

Edvard_Munch_-_Separation_-_Google_Art_Project

बिछड़ गए हम आपसे जिस लम्हे में, उस लम्हेने सारा सुकून छीन लिया,
चैन खो गया दिलका जैसे, डोर से टूटकर पतंगने अपना वजूद खो दिया,

इरादे सहम गए ज़िंदा रहनेके जैसे गर्दिशने तारोको गुम कर दिया,
खो गई हस्ती आपके बिना हमारी और परछाईओने भी पेहचाननेंसे इन्कार कर दिया,

आसमानोंकी अर्ज़ियां सुनकर लम्हे थम जाते है क्या कभी?
ज़ुन्झ ज़ुन्झ कर अपने आपसे, कोई सुलझता है क्या कभी?

खुदगर्ज़ है ये ज़िन्दगी, कभी कभार कैसे सितम ढाती है?
सितारोंको छूनेकी बात करने वालोको, हमेशा ज़मीनही क्यों नसीब हो जाती है?

दिन और रात गुजर जाते है रोज़, बिखरे हुए दिलके टुकड़े इकट्ठा करनेमें,
फिर मिलने की आसने ज़िंदा रखा है, वरना कितना वक्त लगता है अपने आपको मिटानेमें।


Wish You All A Very Happy World Poetry Day..!! 😀 😀

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