इन आँखोकी इनायत देखकर

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हररोज़ तो देखते थे हम एकदुसरेको,
फिर हम मुस्कुराकर देखते थे तो क्यों मुकर जाते थे,
गुफ्तगू करनेका प्रयास जबभी हम करते थे,
तो उन आँखोसे अजनबी होनेका पैगाम क्यों दे जाते थे।

तुम्हे क्या पता कितनी हिम्मत जुटाकर,
अपना मन बनाकर आपसे गुफ्तगू करने आये थे,
कितनी सारी बाते ज़ेहनमें रखकर,
धड़कते हुए दिलके साथ तुम्हारे पास आये थे।

नाम न था पता आपका, बस आँखोसे रूबरू थे,
फिरभी आपने निगाहे मिलातेही हमे पहचाना तक नहीं ,
ठुकरा दिया इस कदर की हैरान रह गए थे,
हमारी मासूम बातोंमे छुपी सच्चाईको समझा तक नहीं।

हिम्मत जुटानेवालोको ऐसे ठुकराता हे क्या कोई,
दिल्लगी करनेका ऐसा सिला देता हे क्या कोई,
वो तो आपकी आँखोमे सारा जहा दिख गया वरना,
ऐसे ठोकर खानेके बाद संभालता हे क्या कोई।

जमानेमें तो बदनाम हो ही गए है मदहोशीके लिए,
होशमें भला कैसे रह सकता है कोई उन आँखोमें झाककर,
अफ़सोस नहीं हे हमे हमारे मदहोश रेहनेके लिए,
ये बेखबर जमानाभी बहक जायेगा इन आँखोकी इनायत देखकर।

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