आज वो बिंदी लगाके आयी थी..


न बता पाए हम किसीको,
वो कितनी खूबसूरत लग रही थी,
आज वो बिंदी लगाके आयी थी,

क्या तारीफ करे, क्या नगमे सुनाए,
वो एक दिलकश गझल लग रही थी,
आज वो बिंदी लगाके आयी थी,

जैसे गर्मी में ठंडी हवा का झोंका आ जाए,
वैसे रूह को मिला हुआ सुकून लग रही थी,
आज वो बिंदी लगाके आयी थी,

नूर आ गया महफ़िल में उसके आते ही,
वो गर्दिश में चमकता तारा लग रही थी,
आज वो बिंदी लगाके आयी थी,

कुदरत में जैसे नया साज है आया,
वो पंछियो के रागों में बसी रागिनी लग रही थी,
आज वो बिंदी लगाके आयी थी,

कह रहा था हर कोई हमे बावरा,
वो कोई कबूल हुई दुआ लग रही थी,
आज वो बिंदी लगाके आयी थी..


ये शाम कभी खत्म ना हो..


तुम्हारे दीवानगी की दास्तां हम सुने,
हमारे आवारगी के किस्से तुम सुनो,
सुहानी यादे दोहराते ये वक्त युही गुजर जाए,
पर ये शाम कभी खत्म ना हो..

कुछ दर्द तुम बाटो, कुछ खुशी हम बाटे,
कुछ हसी तुम बहाओ, कुछ आंसू हम बहाए,
करवटों से भरे कुछ लम्हे युही बीत जाए,
पर ये शाम कभी खत्म ना हो..

अतीत के कुछ राझो का जिक्र तुम करो,
कल के सपनों का गुलदस्ता हम खोले,
ऐतबार का ये सिलसिला युही चलता रहे,
पर ये शाम कभी खत्म ना हो..

अपने छुपे अरमनोसे वाकिफ तुम करवाओ,
हमारे दबे जज्बातोसे रूबरू हम करवाए,
बेझिझक बातो का दौर युही चलता रहे,
पर ये शाम कभी खत्म ना हो..

See You Again


She was the inspiration behind the first poem of my life. Oblivious of what is going on with her and without any thought of her since I don’t know when, she appeared unexpectedly. Not in my thought, but in front of me. I thought Goa trip was over, memories of the trip were over. But they were not. It was the last phase in the journey back to home of the finally executed Goa trip, from Katraj to Nigdi. She boarded on the bus, searched for a place hastily. As she entered, I noticed she was wearing bangles, the same ones a girl wears after marriage. The same style. I thought she was married. My heart pulsated. I don’t know why. She settled down. I looked at her, and I am not sure if we exchanged glances or she remembered who I am, because I shied away as I anticipated she will turn her gaze toward me. No, it was not possible. She can’t be married. I don’t know why I was concerned about her marital status. She was my crush and I never talked to her. Not even once. What should I do? Should I talk to her or let it be the way it was?

After 12th standard, I saw her once, not once, twice, at two different bus stands. Both times, she didn’t see me. This was the third time. Again, I thought about whether to talk to her or not. I had never dared to talk to her in 12th standard, given her confrontational, sassy, and cocky nature. In addition, this indecision and chaos was result of terrible past experiences of initiating conversations. Once I initiated a conversation, I got scolded from teacher, peon, and principal. Then in another incident, I got a patronizing look from a girl, her disposition showing I am a downmarket pervert. Then I approached a girl and she turned around and walked away with a face like nothing happened. I felt like I had been misunderstood every time. This history loomed large over my capacity of decision-making when it came to the matters of the heart. This time, I feared, would not be different. I would try to say something and it might backfire. I decided to let it be the way it was. I don’t want to end up getting scolded from bus conductor, beaten up by fellow passengers, and thrown out at 11:30 pm for misunderstanding that may arise. There was no transport available besides cabs at that hour. Enough with shitty excuses, the truth was meri fatt rahi thi. Yes, meri fatt rahi thi.

The crowd was less as the bus moved forward and her conversations on the phone were audible. I learnt she attended her friend’s marriage and those bangles were for that occasion. That was the only consolation for the night. Besides that, my cowardice persisted. I didn’t talk to her. Then she descended at her stop and I did what I always did. I wrote a poetry. She was the inspiration for my first poetry and she is also the inspiration for the following poem I wrote.

तकदिरकी साजिशोंमें कही कोई राझ छुपा तो नहीं,
इत्तिफ़ाक़तले मिलने वाले मुसाफिरों की कही मंजिल एक तो नहीं..

मिलन लिखा हो तकदिरमे, तो मिलेंगे फिर इक बार इत्तिफ़ाक़तले,
पर उस दफा, मंजिल की परवाह किए बगैर, बस उस सफर की खूबसूरतीतले।


P.S. In case, you want to read that first poem, here is the link:


आसूओमें शरीक ना हुए तो बात क्या


शिकायत हमे उस मुकद्दरसे नहीं,
जो हमसे उन्हें जुदा कर गया,
शिकायत हमे उस लम्हे से है,
जो आखरी अलविदे के वक़्त थम नहीं गया |

वो मुस्कुराहटे, वो तकरारे, वो मीठी बाते,
वो यादे, दर्द देती हे जर्रे जर्रे से,
बिछडनेसे कुछ अंश निकल गया हमारे अंदरसे,
तो आजकल हम रहते है सहमे सहमे से |

आसू ना बहे, पागल ना हुए,
चंद दिनों का सफ़र सदियो की तरह ना लगे तो बात क्या,
और उन आसूओमें सदियों का सफ़र सिमट कर,
हम उसमें शरीक ना हुए तो बात क्या |

उस मुस्कुराहट के पीछे


जुदाई का ये आलम हमसे,
न जाने क्या क्या करवाएगा,
जब भी याद आएगी उनकी,
न जाने कितने आंसू रुलाएगा,

साथ बिताया हुआ हर लम्हा,
लबों पे मुस्कुराहट तो ले आएगा,
मगर उस मुस्कुराहट के पीछे,
न जाने कितने गम छुपाएगा।

फसा देगी ये आँखे


ये आँखे, फसा देगी ये आँखे एक दिन,
जुबाँ पलट जाए, पर ये अपनी जिद नहीं छोड़ती,
नियत बता देती है, सच बया कर देती है,
और अनजाने में इकरार भी कर देती है।

हमारी तकरार पे आँखे मासूमियत से बोली,
आदत है मुझे ताने सुनने की,
क्या करे, यहाँ लोगो के दिल बहक जाते है ,
और कसूर नजर को दिया जाता है।

इन आँखोकी इनायत देखकर


हररोज़ तो देखते थे हम एकदुसरेको,
फिर हम मुस्कुराकर देखते थे तो क्यों मुकर जाते थे,
गुफ्तगू करनेका प्रयास जबभी हम करते थे,
तो उन आँखोसे अजनबी होनेका पैगाम क्यों दे जाते थे।

तुम्हे क्या पता कितनी हिम्मत जुटाकर,
अपना मन बनाकर आपसे गुफ्तगू करने आये थे,
कितनी सारी बाते ज़ेहनमें रखकर,
धड़कते हुए दिलके साथ तुम्हारे पास आये थे।

नाम न था पता आपका, बस आँखोसे रूबरू थे,
फिरभी आपने निगाहे मिलातेही हमे पहचाना तक नहीं ,
ठुकरा दिया इस कदर की हैरान रह गए थे,
हमारी मासूम बातोंमे छुपी सच्चाईको समझा तक नहीं।

हिम्मत जुटानेवालोको ऐसे ठुकराता हे क्या कोई,
दिल्लगी करनेका ऐसा सिला देता हे क्या कोई,
वो तो आपकी आँखोमे सारा जहा दिख गया वरना,
ऐसे ठोकर खानेके बाद संभालता हे क्या कोई।

जमानेमें तो बदनाम हो ही गए है मदहोशीके लिए,
होशमें भला कैसे रह सकता है कोई उन आँखोमें झाककर,
अफ़सोस नहीं हे हमे हमारे मदहोश रेहनेके लिए,
ये बेखबर जमानाभी बहक जायेगा इन आँखोकी इनायत देखकर।

दुनिया बदलनेवालोकी हिम्मत


दिलकी बाते जानकर, पीठ थपथपाकर,
हौसला बढ़ानेकी शायद ही किसीकी कोशिश होती हैं,
ढ़लतेे सूरजको देखकर मुँह फेरने वाली इस दुनियाको,
उसकी तड़पन कहा पता होती हैं।

हर मुश्किलका सामना करनेके लिए,
जज़्बा अटूट हो जाता हैं जब नियत साफ होती हैं,
आधी-अधूरी बात जानके नजरिया बदलतीे इस दुनियाको,
दुनिया बदलनेवालोकी हिम्मत कहा बर्दाश होती हैं।

बिछड़ गए हम आपसे जिस लम्हे में


बिछड़ गए हम आपसे जिस लम्हे में, उस लम्हेने सारा सुकून छीन लिया,
चैन खो गया दिलका जैसे, डोर से टूटकर पतंगने अपना वजूद खो दिया,

इरादे सहम गए ज़िंदा रहनेके जैसे गर्दिशने तारोको गुम कर दिया,
खो गई हस्ती आपके बिना हमारी और परछाईओने भी पेहचाननेंसे इन्कार कर दिया,

आसमानोंकी अर्ज़ियां सुनकर लम्हे थम जाते है क्या कभी?
ज़ुन्झ ज़ुन्झ कर अपने आपसे, कोई सुलझता है क्या कभी?

खुदगर्ज़ है ये ज़िन्दगी, कभी कभार कैसे सितम ढाती है?
सितारोंको छूनेकी बात करने वालोको, हमेशा ज़मीनही क्यों नसीब हो जाती है?

दिन और रात गुजर जाते है रोज़, बिखरे हुए दिलके टुकड़े इकट्ठा करनेमें,
फिर मिलने की आसने ज़िंदा रखा है, वरना कितना वक्त लगता है अपने आपको मिटानेमें।

Wish You All A Very Happy World Poetry Day..!! 😀 😀

मुझे पता है…


मुझे पता है,
आपको सब पता है, पर बताते नहीं हो,
सब महसूस होता है, पर जताते नहीं हो,

मुझे पता है,
आप सब समझते हुए भी नासमझ रहते हो,
सबके साथ मौजूद रेहकर भी खोये खोये रहते हो,

मुझे पता है,
आप सब सुनकर भी अनसुना करते हो,
सब जानकर भी नज़रअंदाज़ करते हो,

मुझे पता है,
आपको दर्द भी होता है, रोना भी आता है,
और ये सब कुछ,
उस हँसी के पीछे छुपाना भी आता है।

(Image courtesy of pat138241 at FreeDigitalPhotos.net)