गुमसुमसा रहने लगा हूँ

​इस रातकी खामोशीमें गूंज रही बेबसीको सुन रहा हूँ मैं,
इस चाँदके सितारोंसे बने गुमनाम रिश्तेका नाम ढूंढ रहा हूँ मैं।

इस बहती हवामें सिमटी हुई तनहाईया महसूस कर रहा हूँ मैं,
इस जलते दीयेकी लौमें छुपी हुई बेचैनी बुझानेकी कोशिश रहा हूँ मैं।

हुआ है क्या मुझे, जो इतना गुमसुमसा रहने लगा हूँ,
इस जिन्दगीकी भागदौडमे तेजी से बीते हुए लम्होको फिरसे जीनेकी मांग करने लगा हूँ।

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बड़े अरसे के बाद मिले वो

वो हमे बड़े अरसे के बाद मिले। एक दूसरे के सामने आते ही कुछ देर के लिए ना वो कुछ बोल पाए, ना हम।

हमारे बीचकी उस खामोशीको खत्म करते हुए हमने कहा –

इतनी सारी है बातें, कितने सारे है किस्से, कहासे शुरु करे कहा खत्म करे, समझ नही आता,
बिताए है इतने सारे हसीन लम्हें आपके साथ, कोनसे दोहराए कोनसे छोड़ दे, समझ नही आता।

तो उन्होंने कहा –

कुछ ना कहिए, कुछ ना दोहराइए, बस चुप बैठे रहिए।

तो हमने जवाब दिया –

किसीको चुप करानेसे या चुप बैठेनेसे, आँखोंमे आनेवाले आँसुओ को रोका नही जाता,
साथ बिताए हुए लम्होंको नजरअंदाज करके… यादोंको मिटाया नही जाता।